जाति व्यवस्था से पीडि़त 3 हजार लोग करेंगे धर्म परिवर्तन

 

रीतेश रंजन, आईआईएन/चेन्नई, @Infodeaofficial

मिलनाडु के कोयम्बत्तूर में हाल ही में एक रिहायसी इलाके में दिवार गिरने के बाद सरकार के उदासीन रवैये के कारण करीब तीन हजार की तादात में दलित समुदाय के लोग धर्म परिवर्तन करने जा रहे हैं। इस घटना में 17 दलित लोगों की मौत हुई थी। नाडुर गांव में 20 फीट की यह दिवार हिंदु समुदाय के लोगों द्वारा खड़ी की गई थी, जो दलित समुदाय और उच्च वर्ग को बांटती थी।

गौरतलब है कि वर्ष 1981 में तमिलनाडु में ऐसी ही घटना हुई थी। ये लोग जो धर्म परिवर्तन करने वाले हैं वे एक दलित राजनीतिक पार्टी तमिल पुलिगल कटचि से जुड़े हुए हैं। यह धर्म परिवर्तन कार्यक्रम चरणबद्ध तरीके से 5 जनवरी से शुरू होगा।

तमिल पुलिगल कटचि के महासचिव एम. इलावेनिल का कहना है कि हमारी जिंदगी की हमारे धर्म में कोई कीमत नहीं है। अगर ऐसा ही है तो हम क्यों ऐसे धर्म का हिस्सा बने जहां हमारी कोई अहमियत नहीं है। हमने इस भेद-भाव का काफी विरोध किया पर कोई सुनवाई नहीं हुई। जिस व्यक्ति ने इस दिवार को बनाया वह अभी जमानत पर बाहर है। लेकिन जिन लोगों ने इस घटना के खिलाफ प्रदर्शन किया वह अभी भी जेल में हैं।

इस घटना से पीडि़त लोगों का कहना है कि हमारे साथ हमेशा से भेद-भावपूर्ण रवैया अपना गया है। हमें न तो मंदिर में जाने की ईजाजत है और न ही शवाधान स्थल। जिन लोगों ने इस घटना के बाद प्रदर्शन किया उनके खिलाफ प्रशासन ने कई धाराओं में शिकायत दर्ज कर उन्हें जेल के अंदर कर दिया। हम हिंदु है लेकिन धर्म के कारण हमारे साथ कभी कुछ अच्छा नहीं हुआ।

हमे हमेशा समाज में नीचा दिखाया गया। ऐसे में हम उस धर्म का हिस्सा क्यों बने जहां हमारी कोई अहमियत नहीं। हम उस धर्म को ही मानेंगे जहां हमें बराबर का अधिकार मिले।

इलनवेल का कहना है कि जो भी लोग धर्म परिवर्तन करेंगे वो पूरे परिवार के साथ करेंगे। कोयम्बत्तूर, ईरोड, तिरुपुर, नामक्कल और सेलम जिले के दलित समुदाय के लोग इस धर्म परिवर्तन में शामिल होंगे। पिछली बार चार दशक पहले तिरुनलवेली जिले के मीनाक्षीपुरम में 200 दलित परिवारों ने इसलाम कबुला था।

उसी प्रकार रामनाथपुरम में 100 परिवारों ने धर्म परिवर्तन किया था। इस सबका कारण जाति आधारित भेद-भाव और हिंसा थी। हिंदु धर्म के कुछ ठेकेदारों का कहना है कि मुसलिम देशों से मिलने वाले पैसों के कारण लोग भारत मेें धर्म परिवर्तन कर रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है। जबतक यह भेद-भाव खत्म नहीं होगा ऐसा ही चलता रहेगा। इसलाम में जाति व्यवस्था नहींं है इसलिए हम उस धर्म को बेहतर मानतेें हैं जहां हमें बराबरी का हक मिले।

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