तमिलनाडु चुनाव 2026: ‘थलापति विजय फैक्टर’ से त्रिशंकु विधानसभा का खतरा?
युवा मतदाताओं का झुकाव, जातीय समीकरण और महंगाई का असर
2026 चुनाव में बदलता राजनीतिक गणित
Ritesh Ranjan/Chennai, @royret
तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर ज़मीनी सर्वे और राजनीतिक संकेत एक नए समीकरण की ओर इशारा कर रहे हैंl एक ऐसी स्थिति, जहां सत्ता का स्पष्ट जनादेश मिलना मुश्किल हो सकता है। यानी, राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य के केंद्र में हैं अभिनेता से नेता बने विजय, जिनकी एंट्री ने पारंपरिक राजनीति की धुरी को हिला दिया है।
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम और आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। विजय के राजनीति में उतरने से खासकर युवा और असंतुष्ट मतदाताओं को एक नया विकल्प मिला है। ज़मीनी रिपोर्ट्स बताती हैं कि जो वोटर द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम की नीतियों से नाराज़ हैं और जिन्हें भारतीय जनता पार्टी या NDA में भरोसा नहीं दिखता, वे बड़ी संख्या में विजय की ओर रुख कर रहे हैं।
दरअसल, तमिलनाडु में “द्रविड़ राजनीति” का प्रभाव दशकों से कायम रहा है। एक समय ऐसा लगा था कि भारतीय जनता पार्टी इस ढांचे को चुनौती दे सकती है, लेकिन हाल के वर्षों में उसकी असक्रियता और स्थानीय पकड़ में कमी ने उस उम्मीद को कमजोर कर दिया। साथ ही, महंगाई, गैस और पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दों ने आम जनता में नाराज़गी पैदा की है, जिसका असर NDA गठबंधन पर पड़ सकता है।
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम सरकार की कई कल्याणकारी योजनाएं जैसे महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता ने एक मजबूत वोट बैंक तैयार किया है। यही कारण है कि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद DMK की स्थिति पूरी तरह कमजोर नहीं दिखती।
अगर जनसंख्या और सामाजिक संरचना की बात करें तो तमिलनाडु का चुनावी गणित और भी दिलचस्प हो जाता है। राज्य की आबादी करीब 7.7 से 7.8 करोड़ के बीच मानी जा रही है। इसमें पिछड़ा वर्ग (BC/BCM) लगभग 44% और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (MBC/DNC) करीब 27% है। अनुसूचित जाति (SC) की हिस्सेदारी करीब 25% है। यानी, BC और MBC वर्ग मिलकर लगभग 70% से ज्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। परंपरागत रूप से ये वर्ग द्रविड़ दलों के साथ जुड़े रहे हैं, लेकिन इस बार इन वर्गों में भी बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
सबसे बड़ा बदलाव युवा मतदाताओं के रुझान में दिख रहा है। 2026 में तमिलनाडु में करीब 1.18 करोड़ युवा मतदाता हैं, जो कुल वोटरों का 20% से अधिक हिस्सा हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इनमें से लगभग 40% युवा विजय की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह एक बड़ा संकेत है कि राज्य की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव हो रहा है।
वहीं, 40 वर्ष से अधिक उम्र के मतदाता अब भी अपने पारंपरिक दलों द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम और आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कलगम के प्रति वफादार बने हुए हैं। लेकिन 40 वर्ष से कम उम्र के मतदाताओं का झुकाव तेजी से बदल रहा है, जो चुनावी समीकरण को त्रिकोणीय बना रहा है।
यही तीनों फैक्टर युवा मतदाता, जातीय समीकरण और नए राजनीतिक विकल्प मिलकर इस बार के चुनाव को बेहद अनिश्चित बना रहे हैं। अगर विजय अपनी लोकप्रियता को वोटों में बदलने में सफल होते हैं, तो वे न केवल किंगमेकर बन सकते हैं, बल्कि राज्य की राजनीति में स्थायी बदलाव भी ला सकते हैं।
कुल मिलाकर, तमिलनाडु का 2026 विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत दे रहा है। क्या यह बदलाव स्थायी होगा या फिर पारंपरिक द्रविड़ राजनीति एक बार फिर खुद को साबित करेगी यह तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे। लेकिन इतना तय है कि इस बार की लड़ाई अब सिर्फ दो दलों के बीच नहीं, बल्कि एक नई सोच और पुरानी विरासत के बीच है।

मीडिया ने मेगा स्टार बना दिया, लेकिन विजय MGR नहीं। जनता उनके सिनेमा को तो सराहती है, पर राजनीतिक परिपक्वता का इंतजार करेगी। सुमंत रामन, राजनितिक विशेज्ञ

