भारत का समुद्री भविष्य: अंडरवॉटर रोबोटिक्स से नीली अर्थव्यवस्था तक
NIOT के राष्ट्रीय वर्कशॉप में विशेषज्ञों ने कहा—2035 तक 10 अरब आबादी के लिए समुद्र आधारित तकनीक और शोध होंगे विकास की कुंजी

Ritesh Ranjan, INN/Chennai,@royret
चेन्नई के एनआईओटी में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि भारत का भविष्य समुद्र से जुड़ी तकनीक, शोध और नवाचार पर टिका है। “अंडरवॉटर रोबोटिक्स” विषय पर हुई इस दो दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञों ने जोर दिया कि बढ़ती वैश्विक आबादी, घटते स्थलीय संसाधन और समुद्री अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार को देखते हुए भारत को समुद्र-आधारित अनुसंधान पर अभी से बड़ा निवेश करना होगा।
कार्यशाला में नेशनल सुपरवाइज़री काउंसिल ऑन सेफगार्ड्स एंड मेरीटाइम सिक्योरिटी के समन्वयक वाइस एडमिरल बिस्वजीत दासगुप्ता ने कहा कि दुनिया की आबादी 2035 तक 10 अरब तक पहुंच सकती है, ऐसे में आर्थिक विकास का अगला बड़ा इंजन ज़मीन नहीं, बल्कि समुद्र से जुड़ी अर्थव्यवस्था होगी। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत में समुद्री शोध और तकनीक के लिए अलग विश्वविद्यालय बनाए जाने चाहिए।
एनआईओटी द्वारा आयोजित इस वर्कशॉप में करीब 300 शोधकर्ता, शिक्षक और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हुए। यहां भारतीय संस्थानों द्वारा विकसित समुद्री नवाचारों का प्रदर्शन भी किया गया, जिनमें पानी में चलने वाले ड्रोन, अंडरवॉटर टनल और पाइपलाइन मॉनिटरिंग डिवाइस, हल्के लॉन्चर, टॉरपीडो और अन्य समुद्री निगरानी उपकरण शामिल थे। यह आयोजन भारत की समुद्री तकनीक को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
समुद्र आधारित विकास पर जोर
वाइस एडमिरल दासगुप्ता ने कहा कि हम स्वभाव से स्थलीय जीव हैं, इसलिए गहरे समुद्र की तकनीक स्वाभाविक रूप से धीमी गति से विकसित हुई है। उनके अनुसार हवा और जमीन की तुलना में पानी के भीतर संचार, गति और तकनीकी दक्षता कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि समुद्र में रहने वाले जीव प्राकृतिक रूप से अत्यंत दक्ष प्रणोदन प्रणाली रखते हैं, जबकि मनुष्य अब भी पानी के भीतर गति बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में पर्यटन, सुरक्षा, व्यापार और समुद्री अनुसंधान जैसे क्षेत्र तेजी से बढ़े हैं और यह रफ्तार आगे भी बनी रहेगी। इसी संदर्भ में उन्होंने नीली अर्थव्यवस्था को भारत की आर्थिक रणनीति का प्रमुख आधार बताया, जिसमें समुद्री परिवहन, संसाधन, खनिज, अनुसंधान और सुरक्षा सब शामिल हैं।
समुंद्रयान और मात्स्या 6000
एनआईओटी निदेशक बालाजी रामकृष्णन ने बताया कि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान केंद्र के तहत समुंद्रयान परियोजना पर काम चल रहा है। इसका उद्देश्य तीन शोधकर्ताओं को गहरे समुद्र में भेजना है। इस मिशन के लिए विकसित “मात्स्या 6000” को चरणबद्ध तरीके से परखा जा रहा है। उन्होंने बताया कि हार्बर परीक्षण पूरा हो चुका है, दूसरा चरण कुछ महीनों में होगा और 500 मीटर गहराई तक का परीक्षण इस वर्ष के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य है।
रामकृष्णन के अनुसार भारत 2027 तक 6000 मीटर गहराई तक मानव-युक्त समुद्री अभियान की दिशा में बढ़ रहा है। यह उपलब्धि भारत को गहरे समुद्री अन्वेषण की चुनिंदा वैश्विक शक्तियों की श्रेणी में ला सकती है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों और शोध संगठनों के संयुक्त प्रयास से ही ऐसी बड़ी परियोजनाएं सफल हो सकती हैं।
समुद्री डेटा और स्टार्टअप की भूमिका
कार्यशाला में यह भी रेखांकित किया गया कि अलग-अलग संस्थानों द्वारा एकत्र किए जा रहे समुद्री डेटा को एकीकृत करना और उसका विश्लेषण करना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि समुद्री निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, जलवायु अध्ययन और संसाधन आकलन जैसे क्षेत्रों में यह डेटा देश के लिए रणनीतिक संपत्ति बन सकता है।
दासगुप्ता ने कहा कि वैज्ञानिकों, प्रोफेसरों, स्टार्टअप्स और सरकारी संस्थाओं को अलग-अलग काम करने के बजाय साझा विजन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यही समन्वय भारत को अंडरवॉटर रोबोटिक्स, स्वदेशी समुद्री सेंसर और ब्लू इकोनॉमी के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति दिला सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह दिशा
भारत के पास 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा है और विशाल समुद्री संसाधन मौजूद हैं। ऐसे में समुद्र से जुड़ी तकनीक केवल रक्षा या विज्ञान का विषय नहीं, बल्कि रोजगार, उद्योग और आर्थिक विस्तार का भी बड़ा माध्यम बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि भारत समय रहते समुद्री अनुसंधान, मानव संसाधन और तकनीकी नवाचार में निवेश करता है, तो वह भविष्य की ब्लू इकोनॉमी का एक बड़ा केंद्र बन सकता है।

