हिन्दी विकास पर मंथन के साथ दो दिवसीय साहित्योत्सव शुरू

श्रेया जैन, आईआईएन/चेन्नई, @Shreya18  

हिन्दी के राजभाषा से राष्ट्रभाषा तक के सफर, देश-विदेश में हिन्दी की मौजूदा स्थिति और विकास की संभावनाओं सहित विभिन्न बिन्दुओं पर चर्चा के साथ काट्टानकोलत्तूर स्थित एसआरएम विज्ञान व प्रौद्योगिकी संस्थान के हिन्दी विभाग व सृजनलोक प्रकाशन के संयुक्त सौजन्य से बुधवार को दो दिवसीय सृजनलोक अंतरराष्ट्रीय साहित्योत्सव की शुरुआत हुई।

एसआएम के कुलपति डा. संदीप संचेती ने हिन्दी भाषा के उचित स्वरूप की चर्चा करते हुए इसे सुचारू रूप से पढ़ाए जाने पर जोर देते हुए विवि परिसर में हिन्दी भाषा लैब स्थापित किए जाने की प्रेरणा दी। उनका कहना था मातृभाषा के साथ अन्य भाषा के व्यावहारिक प्रयोग को बढ़ावा मिलना चाहिए।

मुख्य अतिथि साहित्यकार चित्रा मुद्गल ने हिन्दी सहित अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के रचनाकारों में आई कमी पर चिंता जताई। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दी की किसी भाषा से दुश्मन नहीं है। यह संपर्क की भाषा है। महात्मा गांधी ने हिन्दी को लेकर जो स्वाभिमान जगाया था वह आज देखने को नहीं मिलता।

अध्यक्षीय भाषण में साहित्यकार डा. दिविक रमेश ने स्पष्ट किया कि हमारा बैर किसी भी भाषा से नहीं होना चाहिए। कोई भी भारतीय भाषा से किसी भी भाषा से कमतर नहीं है। हमें हिन्दी के प्रति प्रेम को इस तरह व्यक्त नहीं करना चाहिए कि अन्य भाषा का अपमान हो।

नीदरलैंड से आईं डा. पुष्पिता अवस्थी और नॉर्वे से आए साहित्यकार शरद आलोक ने विदेशों में हिन्दीभाषियों और हिन्दी की विकास यात्रा पर प्रकाश डाला। इससे पहले हिन्दी साहित्य में योगदान करने वाली कुसुम भट्ट, आशा पाण्डेय, नीरज नीर, डा. रानू मुखर्जी, डा. उषारानी राव, बी. एल. आच्छा व अशोक सिंह को सृजनलोक सम्मान से नवाजा गया। चित्रा मुद्गल पर विशेषांक सहित कुछ पुस्तकों का विमोचन भी अतिथियों ने किया। डा. ऋषभदेव शर्मा ने भी अपने विचार रखे।

उद्घाटन सत्र का संचालन हिन्दी विभागाध्यक्ष डा. एस. प्रीति, डा. रजिया और सृजनलोक के निदेशक संतोष श्रेयांस ने किया।

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