USCIRF रिपोर्ट- धार्मिक अतिवाद की गिरफ्त में आता भारतीय युवा

भारत संगीत देव, आईआईएन/राजस्थान, @Infodeaofficial
धर्म का संबन्ध परोपकार, जनकल्याण, अहिंसा तथा मानवता से है, जबकि अतिवाद किसी मान्यता, विचार व अवधारणा को जबरन लागू कराने की सोच है। धार्मिक अतिवाद का अर्थ-धर्म की रूढ़ व जड़ मान्यताओं को लोगों पर जबरदस्ती थोपना तथा अपने द्वारा किए गए कुकृत्य को सही ठहराना।
हाल ही में जारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में USCIRF (‘यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम’अमेरिका का एक स्वतंत्र द्विपक्षीय निकाय है जो विदेश में धार्मिक या आस्था की स्वतंत्रता के उल्लंघनों पर निगरानी रखता है) कहता है कि 2018 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति खराब हुई है। 2018 में लगभग एक तिहाई राज्य सरकारों ने गैर हिंदुओं और दलितों के खिलाफ भेदभावपूर्ण या गौ-हत्या विरोधी कानूनों को तेजी से लागू किया।
कोरोना वायरस के कहर के बीच यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी कर दी है, लेकिन इस सलाना रिपोर्ट में भारत में कम होती धार्मिक आजादी पर चिंता जताई गई है। भारत को फिर से टीयर 2 में रखा गया है।
भारत जैसे देश में धार्मिक अतिवाद और भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि युवा आबादी सर्वाधिक है। दूसरा भारत एक बड़ी मुस्लिम आबादी वाला राष्ट्र है लेकिन धार्मिक अतिवाद सिर्फ इस्लाम में ही नहीं बल्कि कमोबेश हरेक धर्म में पाया जाता है तो क्या धर्म इसकी इजाजत देता है? बिल्कुल नहीं। वर्तमान समय में धार्मिक अतिवाद का सबसे बुरा असर युवाओं पर ही होता है।
युवा मस्तिष्क बिल्कुल कोरा होता है जिस पर गलत विचारों की परत आसानी से बिठाई जा सकती है। दूसरा युवा असीम ऊर्जा से लबरेज होते हैं। उनमें बहुत कुछ कर गुजरने की चाहत होती है। समझदारी के अभाव में अतिवाद के प्रति उनका सहज आकर्षण हो जाता है। किन्तु भारत की मिट्टी में ऐसा कुछ जरूर है जो यहां के युवाओं को बहकने से थाम लेती है और उन्हें धार्मिक अतिवाद में भटकने नहीं देती।
इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों की तरफ अन्य देशों की तुलना में भारत के युवाओं का बिल्कुल कम रुझान देखने को मिलता है। इसका एक कारण यह है कि भारत में धर्मों का प्रसार अधिकांशतः सूफी संतों/संतो के माध्यम से हुआ है। आज के डिजिटल युग में लोगों का संतों कि तरफ रुझान कम हुआ है और अतिवादियों की संख्या बढ़ने लगी है।
यह भी आश्चर्यजनक तथ्य है कि इसमें शिक्षित इंजीनियर, डॉक्टर, पेशेवर सेवाओं वाले लोग भी शामिल है। इसके सामाजिक कारण भी है, जैसे आर्थिक तनाव, व्यक्तिगत संवेदना, धार्मिक विश्वास, क्रांतिकारी व तत्काल बदलाव की चाहत और अतिवादी गतिविधियों में शामिल संस्थाओं संपर्क में आने जैसे कारण जिम्मेदार हैं।
धार्मिक अतिवादी सोच को बदलने के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने के साथ, रोजगरोन्मुखी शिक्षा, गुरुकुल या मदरसों को आधुनिकता से जोड़ना, सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने जैसी संस्कृति को बढ़ावा देने के साथ उपरोक्त को जीवंत बनाना भी आवश्यक है।

