महाबलीपुलम की पत्थर की मुर्तियों को मिला जीआई सर्टिफिकेशन

-मूर्तिकला विशिष्टता के लिए मिला जियोग्राफिकल इंडिकेशंस

आईएनएन, नई दिल्ली ; @infodeaofficial;  

चेन्नई. हाबलीपुरम तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से कुछ ही दूरी पर बसा ऐसा पर्यटक स्थल है जो देशी और विदेशी सैलानियों के लिए हमेशा से आकर्षण का केंद्र है। यहां मौजूद पल्लव काल के मंदिर, पत्थर की मुर्तियां लोगों के आकर्षण का प्रमुख कारक हैं।
हाथ से तैयार की गई पत्थर की मूर्तियों को इस क्षेत्र की कला विशिष्टता के लिए जीआई रजिस्ट्री द्वारा जियोग्राफिकल इंडिकेशंस दिया गया है। जीआई की मुहर लगने से इन मूर्तियों को अब कानूनी संरक्षण मिलेगा। तमिलनाडु हैंडिक्राफ्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड के बदले यह याचिका तमिलनाडु इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट के अध्यक्ष और अधिवक्ता संजय गांधी ने दायर की थी। यह जीआई मिलने के बाद राज्य सरकार की कॉरपोरेशन अब यह महाबलीपुरम स्टोन स्क्लपचर की आधिकारिक व्यवहारकर्ता हो गई है। गंाधी ने बताया कि यह याचिका उन्होंने ३१ मई २०१३ को दायर की थी लेकिन उन्हें इसमें सफलता प्राप्त करने में चार साल से ज्यादा का समय लग गया।

 

वास्तुकला महाबलीपुरम की पहचाना
यहां की पत्थर की मूर्तियों के चौड़े ललाट, तीखी नाक, ल बीं आंखें, लटकते कान और अंडाकार आकृति होती है। महाबलीपुरम इलाके की गुफा वास्तुकला, पत्थर की वास्तुकला और संरचनात्मक मंदिर पल्लव काल की ऐतिहासिक कला है जिसका इस्तेमाल आज भी यहां के लोग करते हैं। यह कला सातवीं सदी की है जो पल्लव काल के दौरान फलीभूत हुई थी। महाबलीपुरम में इस काल की कई कलाकृतियां अभी भी आपकों देखने को मिल जाएंगी। यहां अभी भी पत्थरों को आकार देने के लिए हथौड़े और छेनी का इस्तेमाल किया जाता है।

 

मक्का ऑफ टीक
मेसर्स निलाम्बुर टीक हैरिटेज सोसाइटी जो केरल के मालापुरम जिले के निलाम्बुर को टीक की खेती के लिए जाना जाता है। यहां की टीक को भी जीआई मान्यता दिलाने के लिए याचिका दायर कर रखी है, जिसे जल्द ही सफलता मिलने की सम्भावना है। टीक विश्व में सबसे शख्त लकड़ी की प्रजाती है। यह लकड़ी काफी महंगी होती है। यह खासतौर पर भारत के अलावा यांमार, थाईलैंड और लाओस में पाई जाती है।
 

गांधी ने अबतक कराए15 जीआई रजिस्ट्रेशन
अधिवक्ता संजय गांधी ने वर्ष 2007 से लेकर अबतक १५ जीआई रजिस्ट्रेशन कराए हैं। इसके अलावा वह तमिलनाडु सरकार के हथकरघा व कपड़ा विभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह तमिलनाडु के इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट के अध्यक्ष और चोलामंडलम आईपी के प्रधान सलाहकार हैं। 17 साल का अनुभव रखने वाले यह अधिवक्ता वर्ष 2000 से आईपीआर के लिए विभिन्न संगठनों का प्रतिधिनित्व कर चुके हैं। इन्होंने अबतक जो जीआई दर्ज कराई है उनमें प्रमुख नाम कांचीपुरम सिल्क, तंजावुर डोल, एतोमोझी ल बे नारियल, तंगालिया शावि, पट्टामाडै पाई, तंजावुर वीनै, कोवै कोरा कॉटन, मदुरै संगुड़ी साड़ी, महाबलीपुरम पत्थर की मूर्तियां हैं। जीआई अधिनियम के तहत उन्होंने कांचीपुरम सिल्क के 21 सोसाइटी को अधिकृत यूजर सर्टिफिकेट दिलाया है। इसके अलावा उन्होंने भवानी जमकलम की 29 सोसाइटी, सेलम सिल्क के 7 सोसाइटी और 82 कोवै कोरा कॉटन को जीआई मान्यता दिलाई है। लोगों में आईपीआर के प्रति जागरूकता लाने के लिए वह हर साल वल्र्ड आईपी दिवस के अवसर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम करते हैं। संजय गांधी ने जापान के टोक्यो में वर्ष 2007 में जापान पेटेंट ऑफिस द्वारा आयोजित 15 दिनों के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भारत का प्रतिधिनित्व किया था। वर्ष 2013 में एशिया पेसिफिक इंडस्ट्री प्रोपर्टी सेंटर और जापान इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोमोशन इनवेशन एंड इनोवेशन द्वारा बैंकॉक में आयोजित इंटरनेशनल फॉलोअप सेमिनार में भी वे हिस्सा ले चुके हैं।

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