सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा प्रायोजित 90 दिवसीय नौटंकी कार्यशाला का हुआ समापन

सुरेन्द्र मेहता, आईएनएन/बिहार, @Infodeaofficial 

संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के तत्वाधान में व ममता पंडित के निर्देशन में पिछले 90 दिनों से चली आ रही नौटंकी कार्यशाला का समापन रविवार के शाम विजय दान देथा की मूल कहानी, अभिषेक पंडित द्वारा नौटंकी शैली में रूपांतरित और ममता पंडित निर्देशित नाटक “गिरबी जोबन” की प्रस्तुति शारदा टॉकीज में किया गया।

कार्यशाला के बारे में नौंटकी की निर्देशक ममता पंडित ने विस्तार से बताया कि संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से पिछले 10 सितम्बर से ही शहर के बीच स्थित शारदा टॉकीज में 90 दिनों का नौटंकी कार्यशाला आयोजित कर रंगकर्मियों को नौटंकी का प्रशिक्षण दिया जा रहा था।

उन्होंने आगे बताया कि नौटंकी उत्तर प्रदेश की प्रमुख लोक नाट्य शैली में एक है,और यह दो सौ वर्ष पुरानी परंपरा है,लेकिन अभी के भौतिकवादी समय में कलाकार पैसे के लिए अश्लील गीत गाने को विवश हैं और अपनी शुद्ध लोक कला को भूलते जा रहे हैं।

इसलिए नौटंकी कार्यशाला आयोजित कर शहर के नव प्रशिक्षु रंगकर्मियों को नौटंकी की विशेष शैली को सिखाने का प्रयास किया गया,ताकि रंगकर्मी अपने इस लोक कला को ज़िंदा रखें और अपने प्रोफेशन में भी नौटंकी को शामिल करें।

नौटंकी कार्यशाला के मार्गदर्शक और बिस्मिल्लाह खां राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित अभिषेक पंडित ने बताया कि नौटंकी भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीनकाल से चली आ रही है,नौटंकी स्वांग परंपरा की वंशज है,नौटंकी और स्वांग में सबसे बड़ा अंतर यह माना जाता है कि जहाँ स्वांग ज़्यादातर धार्मिक विषयों से ताल्लूक रखता है,वहीं नौटंकी मौजू प्रेम और वीर रस पर आधारित होते हैं,उनमे व्यंग और तंज़ मिश्रित किए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश शासन के अंतर्गत, सदस्य लोक व जनजातीय कला के विशेषज्ञ हीरा शर्मा ने प्रशिक्षण के दौरान छात्रों को उत्तर प्रदेश की लोक कला कहरवा,धोबिया,पंवरिया आदि के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि नौटंकी में कविता और साधारण बोलचाल को मिलाने की प्रथा शुरू से रही है। पात्र आपस में बातें करते हैं,लेकिन गहरी भावनाओं और संदेशों को अक्सर तुकबंदी के ज़रिए प्रकट किया जाता है।

कार्यशाला में देश के चर्चित नौटंकी के गायक अजय मुखर्जी ने छात्रों को नौटंकी गायन शैली से परिचय करवाया।

नौटंकी शैली पर आधारित “गिरबी जोबन” में एक ग़रीब पंडित और समाज के धनी सेठ के बीच का अंतर्द्वंद को बखूबी दिखाया गया, नाटक के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया कि आज भी समाज में पूंजीपतियों का ही ज़ोर चलता है और ग़रीब लोग अपनी दयनीय स्थिति पर रो रहे हैं और हमेशा अपनी दुखों को दूर करने के लिए भगवान पे आश्रित रहते हैं,क्योकि समाज उनके लिए कुछ नही करता है ।

नाटक में मुख्य भूमिका शशिकान्त कुमार(पंडित),रितेश रंजन(सेठ) डी.डी संजय (शिव),प्रीति(पार्वती),रामजन्म चौबे(गणेश),अंतिमा(बेटी)अंगद कश्यप,संदीप (जोकर)श्रेयांस (दूल्हा) मज़दूर और गायन कोरस में – सुजल,शिवम,रहमान,अभिनय,आदित्य अभिषेक पुनीत,प्रिंस,सूरज ने अपने अभिनय और गायन शैली से दर्शकों को काफ़ी प्रभावित किया।

संगीत निर्देशन आतमजीत सिंह ने किया , संगीत सहायक हारमोनियम पर शहादुर,झाल-रामप्रवेश निराला, नगारा-बहादुर, ढोलक-अजय कुमार , मंच परिकल्पना-अभिषेक पंडित ने किया,प्रकाश परिकल्पना-रंजीत कुमार का सराहनीय रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि जिलाधिकारी श्री शिवाकांत द्विवेदी ने किया, मौके पर विशिष्ट सदस्य लोक व जनजातीय कला(उत्तर प्रदेश शासन) हीरा शर्मा, युवा रंगकर्मी व फ़िल्म अभिनेता सुनील उपाध्याय,नागरी नाटक मंडली वाराणसी के प्रभारी अर्पित सिधोरे,डॉ स्वस्ति सिंह,डॉ ख़ुशबू सिंह,डॉ हेमबाला,डॉ अमित,डॉ सी. के त्यागी,कुलभूषण सिंह,अरविंद अग्रवाल,दीपक यादव विजय यादव,मनीष तिवारी,प्रवीण सिंह,आदि मौजूद थे।
मंच संचालन डॉ अलका सिंह ने किया।

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