रिश्वत मांगने और लेने के आरोप के आधार पर किसी को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं माना जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

आईएनएन/नई दिल्ली, @Infodeaofficial
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 20 के तहत केवल रिश्वत मांगने और लेने के आरोप के आधार पर किसी को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार के पूर्व मंत्री दिलीपभाई नानूभाई संघानी की अपील मंज़ूर करते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (अधिनियम) की धारा 7, 8, 13(1)(ए), 13(1)(डी) और 13(2) के तहत उनके खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि लोक सेवक द्वारा रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के मामले में साक्ष्य अपराध को स्थापित करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है। संघानी पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने सरकार द्वारा अनिवार्य टेंडर प्रक्रिया का पालन किए बिना राज्य के जलाशयों में मछली पकड़ने के ठेके दिए, जिसका मकसद रिश्वत के बदले में कुछ व्यक्तियों को फायदा पहुंचाना था। नीति से प्रभावित एक व्यवसाई ने मंत्री पर रिश्वत का आरोप लगाया था हालांकि, रिश्वत देने या लेने के कोई साक्ष्य नहीं दिए गए।
कोर्ट ने कहा कि पद के दुरुपयोग को हर मामले में रिश्वत का लेन देन या भ्रष्टाचार नहीं माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2022 में 5 जजों की संविधान पीठ साफ कह चुकी है कि बिना मूलभूत मौखिक या दस्तावेज़ी साक्ष्यों के किस लोक सेवक को सिर्फ अनुमान के आधार पर भ्रष्टाचार का दोषी नहीं माना जा सकता।

