खामोशी विरोध का स्वर भी- स्टरलाइट विरोध प्रकरण

आईआईएन/नई दिल्ली, @Infodeaofficial
खामोश रहकर भी आप अपना विरोध जता सकते हैं। किसी की चुप्पी उसकी स्वीकार्यता नहीं, विरोध का स्वर भी होता है। इसके लिए उस खामोशी को समझने की जरूरत होती है। यह कहना है स्टरलाइट विरोध को आवाज देनी वाली सामाजिक कार्यकर्ता फातिमा बीबी का।
एक विशेष साक्षात्कार में फातिमा बीबी ने स्टरलाइट मामले के उन पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया जिसे मानने से कानून, सरकार और प्रशासन ने इनकार कर दिया था।
इस परियोजना के दुष्परिणाम का अहसास लोगों को इसके शुरुआती दिनों से ही होने लगा था और कुछ ने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई लेकिन उनकी आवाज को दबा दिया गया। साल 1996 में जब यह परियोजना शुरू हुई थी तो सबसे पहले स्थानीय मछुआरे इसके विरोध में उतर आए।
स्टरलाइट प्लांट के लिए जो कच्चा माल विदेशों से समुद्री मार्ग से मंगाया जाता था वह निर्धारित मात्रा से अधिक होता था। जिसे कंपनी के प्रतिनिधि समुद्र किनारे से कुछ दूर पर निकाल देते थे।
जल्दबाजी के कारण इस प्रक्रिया में इस कच्चे माल की कुछ मात्रा समुद्र में गिर जाने के कारण इसका पानी दूषित होने लगता था। जब इसका अंदाजा स्थानीय मछुआरों ने लगाया तो वे इसके विरोध में उतर आए। इसके लिए मछुआरे एक गुट बनाकर समुद्र के किनारे रातभर पहरा देते थे ताकि कंपनी को ऐसा करने से रोका जाए।
मछुआरों के इस विरोध से परेशान होकर कंपनी ने दूसरा तरीका अपनाया और अधिक मात्रा वाले कच्चे माल को तमिलनाडु के पड़ोसी राज्य की समुद्री सीमा में उतारना शुरू कर दिया जिसे बाद में सड़क मार्ग से तुत्तुकुड़ी लाया जाता था।
जनता की जिंदगी के प्रति संवेदनहीन रही डीएमके व एआईएडीएमके सरकार
स्टरलाइट प्लांंट के शुरू होने के कुुछ ही सालों में इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे। स्थानीय लोगों की सेहत पर इसका असर दिखने लगा लेकिन अपने-अपने शासनकाल में डीएमके व एआईएडीएमके सरकार ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। 5 जुलाई 1997को जब इस प्लांट से गैस लीक हुई तो इसमें कई लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
सरकार ने इसकी जांच के लिए एक टीम गठित की और निष्कर्ष यह निकला कि इसमें स्टरलाइट दोषी नहीं है। लेकिन अगर इसमें स्टरलाइट दोषी नहीं था तो क्या जांच टीम का यह कर्तव्य नहीं बनता था कि कंपनी को दोषमुक्त करने के बजाय इसके दोषियों की पहचान कर उनको सजा दिलाए? लेकिन तब सरकार ने स्टरलाइट को क्लीन चिट देकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
घटनाक्रम
कंपनी के आस-पास के इलाकों में रहने वाले लोगों पर धीरे-धीरे इसका दुष्प्रभाव पडऩे लगा और उन्होंने विरोध भी किया लेकिन कंपनी येन-केन-प्रकारेण उन परिवारों के विरोध के स्वर को दबाती रही।
जब प्लांट के पास ऑल इंडिया रेडियो के एक कर्मचारी भी इसके दुष्प्रभाव का शिकार हुआ तो अधिकांश कर्मियों ने प्लांट को बंद कराने की शिकायत अपने उच्च अधिकारियों से की या फिर केंद्र को अन्यत्र स्थापित करने की मांग की लेकिन उनके बड़े अधिकारियों ने इस पर गौर नहीं किया। ऐसी ही एक घटना बिजली विभाग के एक इंजीनियर के साथ घटी, पहले उसने इसके खिलाफ शिकायत की लेकिन बाद में शिकायत वापस भी ले ली।
कइयों की जिंदगी निगल गई
जब इलाके में हरेक घर में इसके दुष्परिणाम झेलने वाले मिलने लगे तो आए दिन कोई न परिवार प्लांट के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करता, जिसे कंपनी किसी भी माध्यम से चुप करा देती। फिर कंपनी ने इस समस्या से निपटने के लिए एक नया तरीका अपनाया। जिसके फैक्ट्री में काम के लिए उत्तर भारत से गरीब मजदूरों की भर्ती की जाने लगी।
दुखद यह है कि अपने प्रदेश और परिवार से दूर इन मजदूरों को कुछ होता भी तो इनके बारे में पूछने वाला कोई नहींं होता। जब इनके परिवारवाले इनकी खोज करते-करतेे यहां आते भी तो कंपनी इनसे यह कहकर पल्ला झाड़ लेती कि वह मजदूर घर जाने के लिए निकला लेकिन फिर वापस ही नहींं लौटा।
स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर अब बुरा प्रभाव
स्टरलाइट प्लांट के दुष्प्रभाव से अब भी लोग बच नहीं पा रहे हैं। प्लांट के छोड़े गए अवसाद भूजल को दूषित कर दिया है। यही कारण है कि यहां के लोगों को कैंसर, चर्मरोग, आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जबसे यहां यह प्लांट शुरू हुआ तबसे इस क्षेत्र में बारिश नगण्य थी लेकिन जबसे प्लांट पर ताला लगा है इलाके में अच्छी बारिश देखी गई है।
गौरतलब है कि जुविनाइल कैंसर जैसे शब्द का इस्तेमाल यहां के स्थानीय डाक्टरों ने बच्चों की हालत देखकर ही किया था लेकिन इनमें से कोई भी डाक्टर खुल के इसके विरोध में नहीं आया।
जान की कीमत पर विकास नहीं

इस प्लांट से कई स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता था और कइयों के घर का चूल्हा जलता था। लेकिन अगर यह विकास और परिवर्तन लोगों की जान और पर्यावरण की कीमत चुकाकर हो तो नहीं चाहिए ऐसा विकास।
मानव जीवन और पर्यावरण से बहुमूल्य और कुछ भी नहीं। फातिमा बीबी, सामाजिक कार्यकर्ता

