मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य कोई भी भूखा न रहे: स्नेहा मोहन

आईआईएन/चेन्नई, @Infodeaofficial
मुझसे भूखे और गरीब लोगों की पीड़ा देखि नहीं जाती, मै जब भी ऐसे किसी व्यक्तो को देखती हो तो हमेशा यही सोचती हु की किस प्रकार उनकी मदद की जाया।
लॉक डाउन के दरमियान जब प्रवासी मजदूरों के लिए रेल सेवा शुरू की गयी तब कई ऐसे लोग थे सेंट्रल स्टेशन के पास इसी इंतज़ार में डेरा डेल रहते थे की उन्हें भी टिकट मिल जाएगा और वो अपने घर को चले जाएंगे।
ये लोग बिना खाना-पानी के दिनभर धूम में इस बात के इंतज़ार में रहते की कैसे उनका टिकट हो जाए। जबकि टिकट ऑनलाइन रेगिस्ट्रशन के तहत बुक होता है।
इनमे से कई ऐसे भी थे जिन्हे यह भी जानकारी नहीं थी की कैसे ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कैसे किया जाया। यह कहना है स्नेहा मोहनदास का।

जब स्नेहा मोहन को बात की जानकारी मिली तो वह अपनी टीम के साथ ओ से मिलने आई और उसके बाद से नियमित रूप से इन प्रवासी मजदूरों के लिए खाना-पानी की व्यवस्था करने लगी।
स्नेहा मोहन वही नाम है जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का टि्वटर हैंडल के लिए कंटेंट लिखा था!
गौरतलब है कि स्नेहा मोहन लॉक डाउन के बाद से ही असहाय और मजबूर लोगों के लिए भोजन सामग्री की व्यवस्था करती आ रही थी। लेकिन जब इन्हें इन प्रवासी मजदूरों के दुख दर्द के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने यहां भी अपनी सेवाएं शुरू कर दी।
वह बताती है कि शुरुआती दिनों में उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी क्योंकि सभी मजदूर खाना पीने के साथ उनसे एक ही मांग करते थे कि किसी तरह से उन्हें उनके घर भिजवा दिया जाए।
कॉर्पोरेशन के अधिकारी मेघनाथ रेड्डी के साथ मिलकर के इन लोगों के घर वापस जाने की व्यवस्था करवाई।
पैकेट इनमें से काफी लोग ऐसे थे जिन्हें इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि ऑनलाइन आवेदन कैसे किया जा सकता है ताकि उन्हें टिकट मिल सके। उन्होंने और उनकी टीम ने इन लोगों की मदद की।
अब जब आम ट्रेनें चलनी शुरू हो गई हैं तो मजदूरों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं लेकिन अभी भी काफी तादाद में यहां मजदूर फंसे हुए हैं।
वह बताती हैं कि अब उनका ध्यान दोबारा उम्र दराज और बेसहारा लोगों की सेवा पर शिफ्ट हो गया है। जो लॉक डाउन के कारण दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं।

वह कहती हैं कि उनका उद्देश्य यही है कि कोई भी भूखा ना सोए इसीलिए उन्होंने फूडबैंक की स्थापना की है।

