परिस्थिति कैसी भी हो पीसना गरीबों को ही पड़ता है

विष्णुदेव मंडल, INN/Chennai, @Infodeaofficial
परिस्थितियां कैसी भी हो पीसना हमेशा गरीबों को ही पड़ता है। चाहे वह बाढ़ हो, भूकंप हो, सुनामी या फिर कोई प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदा। इन सभी परिस्थितियों में अक्सर गरीब ही परेशान और बदहाल होते हैं।
मैंने 2004 का सुनामी देखा है, 2015 में बाढ़, 2016 मे वर्धा तूफान और 2020 में कोरोना महामारी को झेल रहा हूं। इन सभी आपदाओं में मैंने एक बात गौर की है कि जिनके पास पैसा होता है वह किसी भी परिस्थिति को झेल लेते हैं इनके पास पैसा नहीं होता उनके लिए जिंदगी भी मौत से बदतर हो जाती है।
चेन्नई के नीलांगरै स्थित एक लकी सलून चलाने वाले बिहार निवासी जिवनाथ ठाकुर का यही कहना है। वह बताते हैं कि उन्होंने कितनी आपदाएं झेली लेकिन कोरोना महामारी सब पर भारी निकली है।
वह बिहार से बाहर तमिलनाडु में बेहतर कमाई और बेहतर जिंदगी का सपना लेकर आए थे। जो काफी हद तक कामयाबी भी हुआ लेकिन करोना कल का क्या प्लान है इस पूरे कामयाबी पर पानी फेर दिया।
उसी सलून में काम करने वाले विद्यापति ठाकुर बताते हैं कि सरकार में लॉकडाउन के बाद से जो नियम जारी किए हैं, उससे हम लोगों की दुकानदारी नहीं चलने वाली। 2 महीने के बाद दुकान खुला है। उस पर से सरकार ने कई नियम कायदे जारी कर दिए हैं। पीपीई किट, यूज एंड थ्रो नैपकिन, बाल दाढ़ी बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाले औजारों को समय-समय पर सैनिटाइज करना।
यह सब बड़े ब्रांड वाले सलून ओं के लिए सही है, हम जैसे लोगों के लिए नहीं। हमारे यहां वैसे ही लोग आते हैं जिनकी आमदनी कम होती है और हमारे यहां कम पैसे में उनका काम भी हो जाता है।
पनायुर में सलून चलाने वाले उमेश ठाकुर का कहना है कि अगर हम इन सरकारी नियमों की पालना करने लगे तो हमारे पास आमदनी से ज्यादा नुकसान ही होगा। फिर भी जितना हो रहा है हम अपनी ओर से नियमों की पालना करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं।
लेकिन तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में दोबारा लॉकडाउन की घोषणा कर दी है अब ऐसी स्थिति में हम जैसे लोगों के लिए जीना दुश्वार हो गया है। ऐसे माहौल में घर भी नहीं जा सकते और यहां सरकार की ओर से हमें किसी प्रकार की सुविधा भी नहीं मिल रही।
उस पर से दुकान का किराया बिजली बिल भरना अलग पड़ता है। सरकार को हम जैसे प्रवासी लोगों के बारे में भी सोचने की जरूरत है।

