अमीरों पे मेहरबान, गरीब हो रहे परेशान

आईआईएन/चेन्नई @Infodeaofficial
जहाँ एक तरफ मंत्रियों, विधायकों की सिफारिश पर फ्री में कोटा में फंसे कई विद्यार्थियों को विशेष वाहनों द्वारा उनके घर पहुँचाया गया। वहीं लॉकडाउन में फंसे मजदूरों की सुध लेने वाला कोई भी नहीं है|
इनमें से कई तो ऐसे है जो खुद ही पैदल चल पड़े, कुछ पहुँचे तो कुछ ने मंजिल पर पहुँचने से पहले ही दम तोड़ दिया। हमारे देश में गरीब की जान की कोई भी कीमत नहीं है और अमीर और रसूखदार के लिए हर चीज़ संभव है।
चेन्नई से करीब 30-35 किलोमीटर दूर पेरुमबाक्कम इलाके में हमारी मुलाकात कुछ ऐसे ही लोगों से हुई जो लॉकडाउन के बाद से किसी तरह से दिन काट रहे हैं और इस इंतज़ार में है कि कब लॉकडाउन खत्म हो और वह घर वापस जा सकें।
इनलोगों को दिन में बस एक समय का भोजन मुश्किल से मिल पाता है। जिस कंपनी के लिए ये लोग काम करते हैं उनलोगों ने लॉकडाउन के बाद से अबतक इनकी सुध नहीं ली।
ये वो मजदूर हैं जो अपनी मेहनत से बड़े-बड़े बिल्डर और कंस्ट्रक्शन कंपनियों को करोड़ों का माल कमाने का मौका देते हैं। लेकिन अब जब यह लॉकडाउन हुआ है तब उसी कंपनी ने इन गरीब और बेसहारा मजदूरों से मुँह मोड़ लिया।
हम बात कर रहे हैं मलेश आशिरा नामक कंस्ट्रक्शन कंपनी की| जिसके चेन्नई महानगर समेत कई अन्य शहरों में रेजीडेंसियल काम्प्लेक्स हैं और कई निर्माणाधीन काम्प्लेक्स हैं|
इन्हीं निर्माणाधीन रेजिडेंशियल काम्प्लेक्सों में काम करने वाले करीब 400 से 500 मजदूर आज दाने-दाने को मोहताज है। लॉक डाउन के बाद से इन्होंने कांट्रेक्टर, इंजीनियर से बात करने की काफी कोशिश की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई| इनकी मदद के लिए कोई आगे नहीं आया।
इनके पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि यह वापस घर को जा सकें और न ही किसी बड़े या रसूखदार लोगों तक इनकी पहुंच है जिससे की इन्हें विशेष वाहनों द्वारा इनके घर पहुंचाया जा सके।
ये लोग बताते हैं कि इनके पास जो पैसे थे वह खत्म हो चुके हैं, एक टाइम का भोजन खाकर किसी तरह समय काट रहे हैं। कई ऐसे लोग भी हैं जो अपने घरों से पैसा मंगा कर जीवन काट रहे हैं। उनका कहना है कि अब कमाने इसलिए आए थे ताकि घर पैसा भेज सकें लेकिन परिस्थिति ऐसी आगे कि अब उन्हें घर से ही पैसा मांगना पड़ रहा है।
कंपनी की बेरुखी देखते हुए इन मजदूरों में काफी असंतोष भर आया है। मजदूर बताते हैं कि जैसे ही लॉकडाउन खत्म होगा सारे के सारे मजदूर साइट छोड़कर अपने-अपने घर चले जाएंगे।
यह मजदूर बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, व कई प्रदेश से यहां काम करने के लिए आए हैं। इन्हें डर है कि कोरोना बीमारी से पहले कहीं भूख से इनकी जान न चली जाए।

