क्या सही मायनों में हम आजाद हैं या अभी भी देश को आजादी की जरूरत है

भरत संगीत देव /आईएनएन/नई दिल्ली@infodeaofficial,

देश में हर वर्ष बड़ी ही धूमधाम से 15 अगस्त के दिन आजादी का जश्न मनाया जाता है और देश के प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम उपलब्धियों भरा भाषण दिया जाता है जिसमे  बताया जाता है कि देश ने कितनी तरक्की की है और खुद की सरकार की अनगिनत उपलब्धियों का बड़ा चढ़ा कर गुणगान किया जाता है।साथ ही साथ आने वाले समय में जरूरी योजनाओ को लागु किया जाना शामिल है|लेकिन आजादी के इतने वर्षों के बाद भी  ऐसा लगता है कि देश को अभी कई और आजादियों की जरूरत है।

आज भी देश में व्यक्ति , सम्बन्धित वर्गों और देश की जनता की आवाज मीडिया को स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति जैसी आजादी पूर्ण रूप से नही मिल पायी है। सरकार के साथ साथ विभिन्न एजेंसियों के  द्वारा ही मीडिया का गला घोंट दिया जाता है।इसके अलावा आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में कई वर्ग ऐसे हैं जिन्हें आज भी अपनी आजादी का इंतजार है। देश में बढ़ता भ्रष्टाचार, मॉब लिंचिंग ,बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण तथा गरीबी के कारण आजादी शब्द के मायने खत्म होते जा रहे हैं। जहां की जनता अपने लिए भर पेट भोजन जुटाने के काबिल भी नहीं वहां आजादी की बातें भी बंधन में जकड़ती महसूस होती हैं। इन अभावों के साथ कैसे कहें कि हम आजाद हैं।वर्तमान में देश भुखमरी को लेकर विश्व में १०० वां स्थान रखता है|  आज हम कहीं नक्सलवाद से लड़ रहे हैं तो कहीं आतंकवाद से, कहीं जातिवाद से तो कहीं भ्रष्टाचार से, और तो और हमारे देश की अधिकतर महिलाएं तो सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं।

 आज भी उन्हें इंतजार है उस आजादी का, जो एक औरत को उसकी सही पहचान दिलाने में मदद करे, देश की आधी आबादी को इंतजार है उस आजादी का, जो उनकी प्रतिभा को पनपने के पूर्ण अवसर दें, देश की बहन-बेटियों को इंतजार है उस आजादी का, जहां वे बेखौफ रहकर अपने सम्मान की रक्षा कर पाएं। हमारे आजाद भारत में हमारे ही परिवार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा आज भी लड़ रही हैं उस आजादी के लिए जो स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी उनसे दूर है।IMF की मेनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टिन लेगार्ड ने भी अपने बयान में कहा की मोदी सरकार को महिलाओ की सुरक्षा को लेकर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है |भारत में महिलाएं पूर्ण रूप में सुरक्षित नही है | हमारे यहां उन्हें समानता का अधिकार देना तो दूर एक आम नागरिक होने तक का सम्मान प्राप्त नहीं है। इसलिए बार-बार उनके अस्तित्व व आत्मसम्मान को कुचला जाता है। दामिनी, गुडिय़ा जैसी घटनाएं ही महिलाओं की आजादी की पोल खोलने के लिए काफी हैं। इसके अलावा हमारे यहां कभी दहेज के लिए तो कभी बेटी को जन्म देने के लिए भी महिलाओं को सजा देने का अधिकार इस पुरुष प्रधान समाज को है, तो ऐसे में कैसे कहे आधी आबादी कि वह भी आजाद है।
अगर हम बात करें देश के अन्य वर्गों की तो हम सिर्फ कहने के लिए ही विकासशील हैं, देश के मौजूदा हालात देखकर नहीं लगता कि व्यवस्था या अर्थव्यवस्था में कोई परिवर्तन आया है। हां, हालात और बदतर जरूर हो गए हैं। कहने को तो हमारा देश विकासशील है और अपनी उन्नति व सफलता के नए अध्याय लिख रहा है लेकिन ये कैसी उन्नति है जहां देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहा है, अन्य मूलभूत सुविधाओं की प्राप्ति तो उनके लिए बहुत दूर की बात है। एक ओर देश का नौजवान पढ़ा-लिखा होकर भी नौकरी को तरस रहा है, तो दूसरी ओर कुछ बच्चे प्राथमिक शिक्षा से भी महरूम हैं। ऐसा नहीं कि नौकरी न पाने वाले उन युवाओं में प्रतिभाओं की कमी है या फिर शिक्षा से दूर ये बच्चे मंदबुद्धि हैं। कमी इनमें नहीं हमारी व्यवस्था में है। जहां सबको समानता से अपनी आजाद जिंदगी जीने का अधिकार तो है, परन्तु उन अधिकारों को प्राप्त करने की सुविधाएं नहीं। आज जैसे-जैसे देश में संपन्न लोगों की संख्या में इजाफा हो रहा है वैसे-वैसे गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों व उनकी लाचारी में भी इजाफा हो रहा है।
वर्तमान में देश मे नए नए मुद्दों पर होती राजनीति ने विकास के इतर देश मे होती मोब लिंचिंग जैसी नई घटनाएं लोकतंत्र पर ही सवाल खड़ा करने लगी है।हाल ही के दिनों में ऐसी घटनाओं से लगता है देश को भीड़तंत्र से भी आजादी की आवश्यकता है।
आज भी देश का पिछड़ा वर्ग जातिवाद का दंश झेल रहा है। सरकार व व्यवस्था से चोट खाए लोग नक्सली बन रहे हैं। आए दिन किसी न किसी मुद्दे पर सरकार विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। नए राज्यों की मांग देश के टुकड़े कर रही है। वहीं देश के नेता सब कुछ जानकर भी अनजान बनकर चैन की नींद सो रहे हैं। ये लोग हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार कर जनता को छल रहे हैं। तो ऐसे में क्या ये आज की जरूरत नहीं है कि दुष्यंत की पंक्तियों “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए, मेरे सीने में नही तो तेरे सीने में सही हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये” से सीख लेते हुए हम सबको मिलकर व्यवस्था को बदलने की एक प्रभावी पहल करनी होगी। और इस सुधार की पहल पहले किसी एक से ही होगी। पहले किसी एक को ही अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्य को समझना होगा तभी बाकी सभी लोग इस मुहिम में शामिल हो पाएंगे और तभी हम समझ पाएंगे आजादी के सही मायने। इस बदली व्यवस्था से ही मिलेगी हमारी आजादी, हमारी स्वाधीनता।
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