बेचैनी, विद्रोह और पीड़ा का स्वर है – “चलो ! अब आदमी बना जाए”

अरुण अर्णव खरे, आईआईएन/मध्यप्रदेश, @Infodeaofficial
सतीश कुमार श्रीवास्तव “नैतिक” युवा कवि हैं | कुछ समय पूर्व उनका गजल संग्रह आया है – “चलो ! अब आदमी बना जाए” | संग्रह का नाम ही ही व्यवस्था और वर्तमान परिवेश के प्रति उनके मोहभंग होने का आभास देता है | फिर से आदमी बनने की कवायद में जुटे गजलकार का यह संग्रह उसकी पीड़ा का स्वर है जिसमें कहीं कहीं विद्रोह का स्वर भी समाहित प्रतीत होता है |
सतीश कुमार श्रीवास्तव की रचनाओं से साफ पता चलता है कि मौजूदा व्यवस्था के साथ समाहित हो जाना उनके नेचर में नहीं है। हालाँकि कई जगह उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है ‘मैं निलंबित इसलिए क्यों चोर बोला चोर को’ लेकिन हर तरह की चुनौतियों से लडने की जो बुलंद हौसलों की शक्ति उनके पास है उससे वह हर सरल अथवा कठिन परीक्षा में सफल होते आए हैं |
“चलो ! अब आदमी बना जाए” गजल-संग्रह में अलग-अलग मिजाज की कुल 84 गजलें संग्रहीत हैं | अधिकांश गजलों में उनके अंदर की बेचैनी मुखरित हुई है | उनकी यह बेचैनी नैतिक मूल्यों में गिरावट के कारण है, राजनीतिक धकोसलेबाजी से उपजी है, रिश्तों में तल्खियों की देन है, आमजनों की पीड़ा से उद्भूत है और मजहबी दांवपेंचों से जनित है | रिश्तों के खोखलेपन, शहरी जीवन की विसंगतियों, गांव के जीवन के प्रति मोह और सच्चे प्रेम की गजलों में उनका एक अलग मिजाज ही देखने को मिलता है |

सियासी उठापटक के प्रति अपना आक्रोश वह इन शब्दों में व्यक्त करते हैं – “जल रहा है मुल्क, जमकर रोटियाँ अब सेंकिए, राजनीति के लिए, माहौल चंगा हो गया |” एक अन्य गजल में वह कहते हैं –
बोल मत बेबाक सच, वरना गदर हो जाएगा |
कल कोई आरोप उल्टा, तेरे सर हो जाएगा |
कल के कातिल आजकल के मंच के मेहमान हैं,
छोड़ दे गांधीगिरी, वरना मर्डर हो जाएगा |
जन-जीवन और सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिल रही स्वीकृति से आहत हो वह लिखते हैं –
वो तल्खी और तेवर कुछ नजर आता नहीं है अब,
गरम मुट्ठी हुई होगी, लहू ठंडा हुआ होगा |
इससे आगे भ्रष्ट-व्यवस्था पर तंज करते हुए वह कहते हैं –
कागज पर सबको रोटियां, कागज पर सबको घर,
कागज ही हर विकास का अब खाता-बही है |
व्यवस्था के प्रति उनका मिजाज तल्ख तो है लेकिन वह निराशावादी नहीं हैं | वह एक संभावना के साथ सामने आते हैं –
माना कि तेरे कद के बराबर नहीं हूँ मैं |
लेकिन किसी भी बात में कमतर नहीं हूँ मैं |
सुई की तरह सिलता हूँ फटेहाल जिंदगी,
तेरी तरह तलवार या खंजर नहीं हूँ मैं |
शहरों की आपाधापी वाली जीवन-शैली भी उनको विचलित करती है | एक गजल में उनके भावों की बानगी देखिए – “मधुर रिश्ते नहीं मिलते हैं, अपनापन नहीं मिलता | तुम्हारे शहर के जीवन में अब जीवन नहीं मिलता |” एक अन्य गजल के शेर में वह मानवीय सारोकारों में आई गिरावट को लेकर खासे चिंतित लगते हैं – “लाख बदल डालें चश्में या खूब उजाला कर दालें, पर इन्सानों की बस्ती का हर चेहरा धुंधला सा है|”
गांव का जीवन उन्हें लुभाता है | उसकी याद करते हुए वह कहते हैं – “वो गाली गीत वो कजली वो सोहर याद आता है | मुझे इस शहर में मेरा गांव अक्सर याद आता है |” फिर अचानक निराशा घेर लेती है और यह कहने को वह मजबूर हो जाते हैं – “इतिहास हो गए आंगन के खेल सारे, क्वार्टर के दायरे में अब घर सिमट रहे हैं |”
विद्रोह और बेचैनी के स्वरों के बीच कवि ने प्यार की ताकत को कमजोर नहीं होने दिया है | उनका यह कथन काबिले गौर है – “मोम हो जाता है पत्थर प्यार से, प्यार से सारी समस्या हल करें | आप एक दिन आइना हो जाएंगे, पहले अपने आप को निश्छल करें |”
व्यवस्था में बैठे लोगों से वह असंतुष्ट भले हैं, दिल में बेचैनी भी है लेकिन हताश नहीं हैं | एक संभावना के साथ वह आगे जाना चाहते हैं –
माना कि तेरे कद के बराबर नहीं हूँ मैं |
लेकिन किसी भी बात में कमतर नहीं हूँ मैं |
सुई की तरह सिलता हूँ फटेहाल जिंदगी,
तेरी तरह तलवार या खंजर नहीं हूँ मैं |
सतीश जी का यह पहला गजल संग्रह अपने कहन की सहजता के कारण, गजल के मीटर और मानकों की कसौटी पर कमतर होने के बावजूद प्रभावशाली बना पड़ा है | इधर कुछ वर्षों में प्रकाशित हिंदी गजल के अधिकांश संग्रहों में भी गजल के मानकों के प्रति बहुत प्रतिबद्धता नहीं देखी गई है | इस लिहाज से यह गजल संग्रह पठनीय है और कवि के रूप में सतीश जी की पहिचान स्थापित करने की संभावना जगाता है |

