ईपीएस व ओपीएस की खेमेबंदी तेज

एमजीआर शताब्दी समारोह में ओपीएस की उपेक्षा से समर्थक नाराज

अखिल भारतीय अन्ना द्रविण मुनेत्र कणगम (एआईडीएमके) में कुर्सी की लड़ाई में खेमेबंदी तेज होने की अटकलें लगायी जा रही हैं। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि पार्टी की मुखिया व मुख्यमंत्री रहीं जयललिता जयराम के समय ही मुख्यमंत्री पद संभाल चुके उनके उत्तराधिकारी एवं वर्तमान में उप मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम (ओपीएस) व वर्तमान मुख्यमंत्री ईके पलनीसामी (ईपीएस) के बीच सियासी खाई और बढ़ गयी है।

आईएनएन/चेन्नई, @Infodeaofficial 

रअसल, एमजीआर शताब्दी समारोह में र्इ्पीएस की अनुपस्थि​ति इन चर्चाओं को जन्म दे रही है। रविवार को इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ईपीएस ही लाइमलाइट में नजर आए, जबकि उनके सहयोगी उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेलवम की कहीं दूर-दूर तक चर्चा भी नहीं थी। नंदनम स्थित वाईएमसीए मैदान में लगे मंच के पाश्र्व में पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और जयललिता के पास ईपीएस की हाथ जोड़े मुस्कुराते हुए आदमकद पोट्रेट लगा हुआ था। मंच पर ईपीएस का नाम तक नहीं लिखा था। इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी मुख्यमंत्री ईपीएस का खूब बखान किया, लेकिन ओपीएस का नाम तक उनकी जुबान पर नहीं आया।

इस दौरान वृत्तचित्र दिखाया गया, जिसमें पार्टी की जिला इकाइयों के प्रमुख ने भी ईपीएस की ही जयजयकार की। राजनैतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरी कवायद संकेत देती है कि पार्टी की कमान केवल एक आदमी के हाथ में है।

यह या तो ओपीएस को किनारे लगाने का प्रयास है अथवा एमजीआर व जयललिता की तरह पलनीसामी का कद बनाने की कोशिश है। कार्यक्रम में शामिल ओपीएस समर्थक अपने नेता की उपेक्षा से नाराज दिखे। एक ओपीएस समर्थक का कहना था कि कार्यक्रम में ओपीएस का कहीं नाम लिया न जाना जानबूझकर उनकी अहमियत कम करने का प्रयास है।

हालांकि पार्टी के प्रवक्ता व ओपीएस समर्थक माने जाने वाले सी. पोन्नियन ने सफाई देते हुए कहा कि यह राज्य सरकार का कार्यक्रम था।

कार्यक्रम में एमजीआर और जयललिता की उपलब्धियों को दिखाया जाना था। ऐसे में मुख्यमंत्री के रूप में पलनीसामी का इसमें मुख्य भूमिका में आना स्वाभाविक है। जहां तक वृत्त चित्र की बात है तो वह राज्य के सूचना व जनसंपर्क निदेशालय ने तैयार है।

इसलिए सरकार की उपलब्धियों से जुड़ा था, न कि पार्टी से। उधर, पार्टी के आईटी विंग के सचिव एसजी रामचंद्रन ने कहा कि पार्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं में ईपीएस व ओपीएस को लेकर कोई मतभेद नहीं है। यह पार्टी का नहीं, राज्य सरकार का कार्यक्रम था। ऐसे में इसमें मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री ही हो सकते थे। मुख्यमंत्री की उपस्थिति में उपमुख्यमंत्री को प्रमुखता देना उचित नहीं होता।

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